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Pati ki Lachari..................

Subhah savere roz duty bajani hai, !
Thakaan ho yaa ho beemari ..
Lekin fir bhi hamesha yahi kahani hai, !
Soche kabhi toh, mile usse kuch araam,
Mile kuch rahat in bandishoN se ..
Use lekein fir bhi sada fileN banani hain !
Chilchalati dhoop mein roz usse hai jana,
Lut-ta chaein uss pyari neend kaa..
Lekin logoN ko lage ki mast zind-gani hai !
Impression dikhana bhai boss ko..
Acchha aur energetic lage tan va mann..
Suite-boot-perfume ki hi toh sab mehrbaani hai !
Pohonche fir woh daftar, dekhe kaghaz farr farr,
Jhele kitne hi undekhe-sune fasane
Bechare ko kabhi boss toh kabhi client se banani hai !
Iss beech poore din jaane kitne shor,
Jaane kitne shigoofe woh dekhe ..
Din bhar sekroN baar apni kabilyat bhi toh Jamani hai !
choor choor ho jata hai dimaag ka system,
Shaam tak Sharir bhi karta hai malfunction,
Fir bhi ghar jaakar biwi ko muskaan dikhani hai !
Bechara bhook se mara, tan bhi kare ishara
Ki mile kuch khaas usko ki thaka bechara..
Lekin ghar laut kar wahi roz roz daal khani hai !
Ados pados mein jo sharmji-varma ji hai..
Ho unse bhi dosti bane bhaichara..
Wajah yahi ki society mein bhi toh image Banai hai !!
Bahar ki duniya woh jhele
aur ghar pe bhi shaanti banani hai..
Lekin iss parr bhi BIWI
…….ko Pareshani hai !!
…………………Pareshani hai !!

मेरी साली और मेरी बीवी

मेरी साली और मेरी बीवी
पहली बार मेरी साली मेरे घर आयी
मेरी बीवी जैसे पहरेदार हो गयी
हसना बोलना खाना पीना मेरा दुश्‍वार हो गया
सोच में मैं पड़ गया
आखिर क्‍यों बीवी मेरी खबरदार हो गयी
क्‍या मैने कोई गलती की या
बहन उसकी ही किरदार बदल गयी
ऐसा क्‍या है, क्‍या हो गया है
सोच में मैं पड़ गया
आखिर क्‍यों बीवी मेरी खबरदार हो गयी
खूब मनाया खूब सुक्षाया
पर असर कोई मुझे न समझ आया
क्‍या बीवी मेरी शक का शिकार हो गयी

सोच में मैं पड़ गया
आखिर क्‍यों बीवी मेरी खबरदार हो गयी
डरने लगा अब मै उस सूरत से
जिस सूरत साली मेरी मुझे बुलाने लगी
क्‍या ये साली ही है कारण जो बीवी मेरी बीमार हो गयी
सोच में मैं पड़ गया
आखिर क्‍यों बीवी मेरी खबरदार हो गयी
मर जाउगां दुनिया छोड़ जाउंगा
धमकी मैंने बीवी को दे डाली, कुछ रुककर
उस एक दिन की यादों में वो तल्‍लीन हो गयी
सोच में मैं पड़ गया
आखिर क्‍यों बीवी मेरी खबरदार हो गयी
जिस दिन साली घर आने वाली थी
उसी दिन सुबह मित्रों हमारी हसीं बनायी थी
और वे चुटकियां बीवी पे सवार हो गयी
सोच में मैं पड़ गया
आखिर क्‍यों बीवी मेरी खबरदार हो गयी
साली होती है आधी घरवाली
ये चुटकी मित्रों की हमारे लिये प्रतिकार हो गयी
सोच में मैं पड़ गया
आखिर क्‍यों बीवी मेरी खबरदार हो गयी
प्रिय, प्रेम हमारा शब्‍दों का मोहताज नहीं
कहावत है, इन पर मेरा कोई राज नहीं
ये कैसी सज़ा मुझपे सवार हो गयी
सोच में मैं पड़ गया
आखिर क्‍यों बीवी मेरी खबरदार हो गयी
जिनको कहना था वा कह गये
साली को आधी घरवाली बता गये
मेरे जैसे सदपतिंयो की जिदगी बरबाद हो गयी
सोच में मैं पड़ गया
आखिर क्‍यों बीवी मेरी खबरदार हो गयी
तब और अब नित मैने यही सहा है
साली का मेरे घर आना मेरी दुर्दशा है
जैसे मेरी कोई सज़ा हो गयी
मैं हूं यूं समझा
ये है एक फितूर और बीवी मेरी खबरदार हो गयी

इम्तिहान न ले

तूं अपने सर पे अदावत का आसमान न ले।

जो लोग चुप हैं कभी उनका इम्तिहान न ले।



जमीन कांप उठेगी लबों के हिलने से,

मैं एक फकीर हूं मुझसे मेरी जुबान न ले।



धरा पर आने से पहले ही है सहमी बेटी,

कि मेरी जान कहीं मेरा बागवान न ले।



छिनाल शब्द का उपयोग कर रहा कुलपति,

गजल डरी है कहीं लूट मेहरबान न ले।



जहां के लोग फसादात को मजहब समझें,

वहां पे मुफ्त भी मिलता है तो मकान न ले।



कहा अदब से कि रस्ता गलत है दहशत का,

जवाब आया हथेली पर अपनी जान न ले।



इश्क में मैंने ही मुमताज कहा है उसको,

अब डरा हूं वो मुझे शाहजहां जान न ले।



हिंदसागर व हिंदकुश की ऋचाओं में अमन

चाह रखता है तो यूरोप का सामान न ले।



मेरी रगों में इन्कलाब की रवायत है,

मेरे अजीज मुझे वक्त गया मान न ले।


Suresh Jain

अगर मैं एक सपना होता.और ये सपना होता सच ....!

अगर मैं एक सपना होता.और ये सपना होता सच ....!


अगर मैं एक सपना होता.और ये सपना होता सच ..!!












अगर मैं एक सपना होता..सच....!!!
खुली वदियों के आशिया मे घूमता,
कभी होता यहाँ कभी होता वहाँ
एक पंक्षी सा आजाद होता
अगर मैं एक सपना होता..सच....!!!



कभी होता पेड़ो की शीतल छांव में.
तो कभी होता पहाड़ो कि ऊँची चोटी पर
खुशियों के होते पर! उड़ता आसमान मे
बनकर पंक्षी प्रकृति के आंगन में
अगर मैं एक सपना होता..सच....!!!

आज रहता यहाँ कल वहाँ
करता मनमानी चाहे जाऊं जहाँ,
खुली हवाओं के साथ चलता चाहे ले जाये जहाँ.
अगर मैं एक सपना होता..सच....!!!

करता लोगो की सारी परेशानियों को छू मन्तर
रहता ना दुख: सुख मे अन्तर
कभी रहता लोगो के दुख: में सामिल
करता लोगो को खुश हर पल.
अगर मैं एक सपना होता..सच....!!!

होते न दूर कभी भी अपने करीबी
रहते सब लोग प्यार से मिल कर
होता ना किसि को किसि से बैर
न होती कोई भूख मरी न कोइ गरीबी .
अगर मैं एक सपना होता..सच....!!!

होती न कभी इस दुनियां में जगं
होते सब अपने लोगो के साथ
ना होती नफरत की आग.
रहते सब लोग बेफिकर होकर सगं
अगर मैं एक सपना होता..सच....!!!


Suresh Jain

मुस्कुराहट

मुस्कुराहट










मुस्कुराहट
पाँच ही दिन हुए उसे ब्याह कर ……
आज जा रही हे पगफेरे के लिए अपने पीहर …….
गहनों से लदी चुनरी में लिपटी ....
कितनी खुबसूरत लग रही हे इसकी मुस्कुराहट होठों पर
….चली जा रही हे सिमटी सी ……..
और मैं कर रहा हु इसका पीछा ..अरे मैं ,,,,,मैं …
मैं इसके सुहाग सेज के कक्ष का सन्नाटा
मैं ही हु जिसने सब देखा था …चुपके से …….
ये लो आ गया इसके बाबुल का आँगन ……
ये देखो ये जा लिपटी अपने बाबुल से
चिपट गई अपनी माँ से ..
और ये क्या भाभियों ने भर लिया अपनी बाहों में ..
में पीछे रह गया सखियाँ पहले पहुच गई ….
बाबुल डबडबाई आँखों से निहार रहे है …..
माँ दुलार रही है ,
भाभियाँ गहनों का भार संम्भाल रही है ….
उभरे वक्षो को देख कर सखिया चुटकिया ले रही है ….
अब सब निपट गया ……
अब चली वो स्नानगृह की और ........
में भी चला उसके साथ उसके पीछे …..
और ..और … और ….ये उतार दी उसने अपनी चोली दामन से ….
और ये देख लिया मैने .......सब कुछ ....
जो कोई नहीं देख पाया था …
ये नीली लकीरे उसके बदन पर ………
जिसे छुपा लिया था उसने अपनी मुस्कुराहट की एक लकीर के पीछे …………………

“मैं कब-कब पागल होता हूँ?

जब मन्दिर-मस्जिद जलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

त्योहारों की परम्परा में, जो मज़हब को लाये,
दंगों के शोलों में, जम कर घासलेट छिड़काये,
जब भाषण आग उगलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते-चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

कूड़ा-कचरा बीन-बीन जो, रोजी कमा रहे हैं,
पढ़ने-लिखने की आयु में, जीवन गँवा रहे हैं,
जब भोले बचपन ढलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

दर्द-दर्द है जिसको होता, वो ही उसको जाने,
जिसको कभी नही होता, वो क्या उसको पहचाने,
जब सर्प बाँह में पलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

जब मैं छोटा था

जब मैं छोटा था,
शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी...
मुझे याद है मेरे घर से "स्कूल" तक का वो रास्ता,
क्या क्या नहीं था वहां,
छत के ठेले, जलेबी की दुकान, बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब वहां "मोबाइल शॉप", "विडियो पार्लर" हैं, फिर भी सब सूना है....
शायद अब दुनिया सिमट रही है......

जब मैं छोटा था,
शायद शामे बहुत लम्बी हुआ करती थी....
मैं हाथ में पतंग की डोर पकडे, घंटो उडा करता था,
वो लम्बी "साइकिल रेस", वो बचपन के खेल,
वो हर शाम थक के चूर हो जाना,
अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है..........
शायद वक्त सिमट रहा है........

जब मैं छोटा था,
शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुज़ोम बनाकर खेलना,
वो दोस्तों के घर का खाना, वो साथ रोना,
अब भी मेरे कई दोस्त हैं, पर दोस्ती जाने कहाँ है,
जब भी "ट्रेफिक सिग्नल" पे मिलते हैं "हाय" करते हैं,
और अपने अपने रास्ते चल देते हैं,
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं.....