इम्तिहान न ले

तूं अपने सर पे अदावत का आसमान न ले।

जो लोग चुप हैं कभी उनका इम्तिहान न ले।



जमीन कांप उठेगी लबों के हिलने से,

मैं एक फकीर हूं मुझसे मेरी जुबान न ले।



धरा पर आने से पहले ही है सहमी बेटी,

कि मेरी जान कहीं मेरा बागवान न ले।



छिनाल शब्द का उपयोग कर रहा कुलपति,

गजल डरी है कहीं लूट मेहरबान न ले।



जहां के लोग फसादात को मजहब समझें,

वहां पे मुफ्त भी मिलता है तो मकान न ले।



कहा अदब से कि रस्ता गलत है दहशत का,

जवाब आया हथेली पर अपनी जान न ले।



इश्क में मैंने ही मुमताज कहा है उसको,

अब डरा हूं वो मुझे शाहजहां जान न ले।



हिंदसागर व हिंदकुश की ऋचाओं में अमन

चाह रखता है तो यूरोप का सामान न ले।



मेरी रगों में इन्कलाब की रवायत है,

मेरे अजीज मुझे वक्त गया मान न ले।


Suresh Jain

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