तूं अपने सर पे अदावत का आसमान न ले।
जो लोग चुप हैं कभी उनका इम्तिहान न ले।
जमीन कांप उठेगी लबों के हिलने से,
मैं एक फकीर हूं मुझसे मेरी जुबान न ले।
धरा पर आने से पहले ही है सहमी बेटी,
कि मेरी जान कहीं मेरा बागवान न ले।
छिनाल शब्द का उपयोग कर रहा कुलपति,
गजल डरी है कहीं लूट मेहरबान न ले।
जहां के लोग फसादात को मजहब समझें,
वहां पे मुफ्त भी मिलता है तो मकान न ले।
कहा अदब से कि रस्ता गलत है दहशत का,
जवाब आया हथेली पर अपनी जान न ले।
इश्क में मैंने ही मुमताज कहा है उसको,
अब डरा हूं वो मुझे शाहजहां जान न ले।
हिंदसागर व हिंदकुश की ऋचाओं में अमन
चाह रखता है तो यूरोप का सामान न ले।
मेरी रगों में इन्कलाब की रवायत है,
मेरे अजीज मुझे वक्त गया मान न ले।
Suresh Jain
इम्तिहान न ले
Posted by Suresh Jain on 7:17 PM




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